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Showing posts from April, 2013

वो कारवां मेरे बचपन का

नीला सा आसमान  था
मेरे बचपन का
उस में उड़ने का
अरमान था
मेरे बचपन का
थी तंग गलियां
मेरे मोहल्ले की
पर उन में
राजा सा सम्मान था
मेरे बचपन का

वो चढ़ जाना
शहतूत के
पेड़ पे
चलाना जोर से
टायर मेन रोड पे
खरचना २ रुपए
कंचे वाली कुल्फी पे
बांधना पट्टियाँ
चोटिल दोनों घुटनों पे
ये तो बड़ा ही
शान का काम था
मेरे बचपन का

होली पर लगाना रंग
टूटी मुंडेर से
उड़ना पतंग
बारिश में चलाना नाव
नहाना ख़ूब
ओलों में जनाब
जन्माष्टमी पे
लगाना झांकिया
दशहरे पे
तीर कमान
दिवाली पे
जलाना हाथ
मिल कर
भाई के साथ
ये तो बड़ा ही
अनिवार्य काम था
मेरे बचपन का

वो बोरिंग के नीचे नहाना
वो पडोसी की घंटी बजाना
वो क्रिकेट में रोमंची खाना
लेके अपनी बैटिंग
बोलिंग से मुकर जाना
ये तो बड़ा ही
साहसी काम था
मेरे बचपन का


नीला सा आसमान  था
मेरे बचपन का
उस में उड़ने का
अरमान था
मेरे बचपन का
थी तंग गलियां
मेरे मोहल्ले की
पर उन में
राजा सा सम्मान था
मेरे बचपन का

जाने कहां छूट गया
वो पल मेरे बचपन का
वो कारवां मेरे बचपन का

काहे की दोस्ती

जो खिलखिला के हँसी
देख कर  मुझको दुखी
देख कर मेरी हँसी
जो हो गई चिडचिडी
जो दोस्ती
हो मतलब पर टिकी
वो दोस्ती
काहे की दोस्ती

जो दारु
पीने से पहले
रोते रहे
जो दारु पी कर भी
फ़िर रो पड़े
जिन जिन को हम
नहीं थे पसंद
उन उन से हम
क्यों जा भिड़े

जो बर्बादी हमारी की
हसरत लिये
मिलते रहे दिल में
नफ़रत लिये
जब ज़रुरत पड़ी
तो लात मार दी
दोस्ती की वो झूठी
तस्वीर फाड़ दी
वो वहाँ है पड़ी
इज्ज़त मेरी
जो दोस्तों ने मेरी
पूरी उतार दी

जो न आई काम
समय पर कभी
वो दोस्ती
काहे की दोस्ती