दावत ऐ दर्द

बस यूं  ही…

१.
इश्क़ के समंदर में
 यूं फ़सा हूँ मैं,
बेख़बर हूँ ख़ुद से
ख़ुद से ख़फ़ा हूँ मैं
आता नहीं मुझे
रूठों को मनना
और वो कहते हैं कि
बेवफ़ा हूँ मैं ।

२.
मुस्कुरा के कभी
जो मिली थी ज़िन्दगी
क्यूँ ख़फ़ा है वो हमसे
हमें  ख़बर नहीं
कैसे कह दूँ ये उनसे
कि जो हैं ग़िले
आज कह दें वो मुझे
आ मिल गले।


रहा वादा कि मर कर भी
तुझको मैं चाहता रहूँगा
गीत अपनी महोब्बत के गाता रहूँगा
है दर्द मेरी तन्हाई में "स्वाति "
इसी से मैं गज़लें बनता रहूँगा। 

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